:: रोहतासगढ़ पर धोखे से हुआ था कब्ज़ा ::
                                                                          
रोहतासगढ़ पर धोखे से हुआ था कब्ज़ा
सन् 1539 ई में शेरशाह और हुमायूँ में जब युद्ध ठनने लगा और हुमायूँ गोध की ओर बढ़ने लगा, तब शेरशाह ने रोहतास के राजा नृपति से निवेदन किया की मैं अभी मुसीबत में हूँ, अतः मेरे जनानखाने को कुछ दिन के लिए रोहतास के किले में रहने दिया जाये । रोहतास के राजा नृपति ने अपने पडोसी की मदद के ख्याल से शेरशाह की प्रार्थना स्वीकार कर ली और केवल औरतों को भेज देने की संवाद प्रेषित किया । कई सौ डोलिया रोहतास दुर्ग के लिए रवाना हुई । और पिछली डोली में स्वयं शेरशाह चला । आगे की डोलिया जब रोहतास दुर्ग के द्वार पर पहुंची, तब उनकी तलाशी होने लगी, जिनमे कुछ बूढी औरतें थी । इसी बीच अन्य डोलियों से सस्त्र सैनिक कूद कूद्कर बाहर निकलने लगे और पहरेदार का कत्ल कर के दुर्ग में प्रवेश कर गये । शेरशाह भी तुरंत पंहुचा और बहुत आसानी से किले पर उसका अधिकार हो गया । प्रताप के वंशज कुछ तो मारे गए और कुछ क्षेत्र छोड़ कर भाग गये । अब शेरशाह अपने जनान खाने तथा राजकोष को रोहितासदुर्ग में सुरक्षित रखकर और रक्षा के लिए १० हजार तोपचियों को नियुक्त करके हुमायूँ के साथ भिड़ाने के लिए गोंड की ओर रवाना हो गया ।

तत्कालीन इतिहासकार अबुलफजल अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ आईने-अकबरी में रोहतास के सम्बन्ध में लिखते हैं "यहाँ की १४ कोस की भूमि कृष कार्य के लिए उपयुक्त हैं । यह स्थान झीलों और झरनों से परिपूर्ण एव रमणीय हैं । बरसात में यहाँ २०० झरने बहाने लगते हैं । यहाँ तीन द्वार ऐसे हैं, जो क्रमशः एक दुसरे से ऊँचे बने हैं । इन द्वारो पर बंदूकधारी सैनिक तैनात रहते हैं और उनके पास पत्थर के बड़े बड़े टुकड़े पड़े रहते हैं, जो मुसीबत के वक़्त नीचे शत्रुओं पर लुद्काए जा सकते हैं । इनके इर्द गिर्द लहलहाते खेतो से भरे पहाड़ी गाँव बसे हैं । पहाड़ी के ऊपर भी, जमीन के थोडा खोद देने पर पानी मिल जाता हैं आदि ।

शेरशाह ने जब शेरगढ़ का किला बनवाया, तब अपने जनानखाने और राजकोष को शेरगढ़ ले गया और रोहतासगढ़ में केवल सैनिक रहने लगे थे । शेरशाह और उसके वंशज समाप्त हो जाने पर कुछ समय तक रोहतासगढ़ पर सुलेमानी कर्रानी के पुत्र दाउद खान का अधिकार भी रहा । इसके बाद अकबर के शासन कल में यहाँ का शासक खान जहाँ अली कुली खाँ हुआ । उसके कुछ वर्ष बाद राजा मान सिंह इस क्षेत्र के शासन कर्ता थे । मान सिंह ने ही किले में बहुत से सुधार करवाए । अपने रहने के लिए महल बनवाया, महल के किनारे पारसी ढ़ंग की एक फुलवारी लगवाई तथा कई मस्जिदे और मंदिर भी बनवाए थे । शाहजहाँ ने जब अपने पिता जहाँगीर के खिलाफ विद्ररोह किया, तब सन् १६४४ ई में जहाँगीर द्वारा नियुक्त किलेद्वर ने शाहजहाँ के परिवार को रोहतास ने प्रवेश नहीं करने दिया था । उस समय ४००० तोपची चारो तरफ से किले की रक्षा कर रहे थे । इसके बाद यह किला मुगलों के पुरे शासनकाल तक उनके अधीन रहा ।

इसके पश्चात् सन् १७६४ ई में मीरकासिम जब मीरजाफर और अंग्रेजो के संयुक्त अभियान के कारण पूर्वी भाग में लगातार हारता गया, तब वह अपने कोष और जनानखाना इसी रोहितासदुर्ग में ले आया । मीरकासिम के कोष के साथ १७०० औरते इस किले में आई थी । किन्तु, बक्सर के युद्ध में भी जब मीरकासिम की बुरी गत हो गई , तब वह तिलौथू भाग गया और शहमुल्क नामक दीवान ने अपने सहित रोहितासदुर्ग को अंग्रेजो के आगे समर्पित कर दिया । अंग्रेजी शासन में यह दुर्ग यदपि अंग्रेजो के अधीन रहा, तथापि प्रायः वीरान सा रहा और इसकी वीरानगी आज भी तक बनी हुयी हैं । बीच में सन् १८७५ ई के स्वतंत्रा संग्राम के समय बाबु बीर कुंवर सिंह के भाई बाबु अमर सिंह ने सिर्फ २५० जबाज सैनिको की मदद से इस किले को अपने अधिकार में कुछ समय के लिए ले लिए थे ।